ब्रिगेडियर आरपी सिंह ने अपने आलेख ‘कश्मीर में नए नेतृत्व की दरकार’ में कश्मीर के मुस्लिम नेता शेख अब्दुल्ला के प्रति आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की आतिशय आत्मीयता से उपजी कश्मीर समस्या के लिए जिन तीन सियासी परिवारों नेहरू, अब्दुल्ला और मुप्ति को जिम्मेदार ठहराया है उसकी नब्ज को कमजोर करने का काम मोदी सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में बखूबी किया है इससे देशवासियों में यह भरोसा कायम हुआ कि समस्याओं से ग्रस्त कश्मीर अब स्थायी समाधान की तरफ बढ़ रहा है|पाक पोसित आतंकवाद कश्मीर की ही नहीं अपितु पुरे देश की समस्या है जिस पर सैन्य आप्रेशन आलआउट के मदद से काफी हद तक काबू पा लिया गया है |बात बात पर परमाणु हमले की धमकी देने वाले पड़ोसी पाकिस्तान की हेकड़ी भी भारतीय वायुसेना की एयर स्ट्राइक ने ढीली कर दी है |इतना ही नहीं अमेरिका और रूस जैसे वैश्विक महाशक्तियो के साथ दुनिया के अन्य मुस्लिम देशों का कूटनीति समर्थन हासिल करके एक आतंक समर्थक देश के रुप में पाकिस्तान की पहचान कायम रखने में भी मोदी सरकार का अभूतपुर योगदान रहा है |जिसके परिणाम स्वरूप भारत को आँख दिखाने वाला पाकिस्तान अब खौफ में जिने को मजबूर हैं |
कौन ज्यादा मेहनती

चुनाव में एक चर्चा बहुत तेज रहती है अखिर राजनीति में सबसे अधिक मेहनती कौन है |इसकी अलग अलग तरह से समीक्षा हो सकता है लेकिन नेताओ को रैली स्थल तक पहुचाने वाले फ्लाइट कैप्टन का अपना अलग नजरिया है |वह यह देखते हैं कि अलग अलग दलों के कौन कौन से नेता समय से अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं और कौन बस रैली स्थल को छूकर भागने के फिराक में रहते हैं
उड़ान का इंतजार

मौसम चुनाव का हो तो ऎसे नेताओं की पूछ बढ़ ही जाती है जो बढ़िया भाषण दे सके या फिर भीड़ जुटा सके |ऎसे में पार्टीया खास स्टार प्रचारकों को विमान या हेलीकाप्टर मुहैया कराती है |कांग्रेस में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के अलावा कुछ चुनिंदा लोगों को ही विमान मुहैया कराया गया है इनमें पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू भी शामिल हैं जिनकी चुनाव प्रचार के लिए उम्मीदवारों में जबर्दस्त माँग है |जबकि संसाधनों की चुनौती की वजह से स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल कई वरिष्ठ नेताओं को विशेष विमान तो दूर हेलिकॉप्टर भी पार्टी मुहैया नहीं करा पा रही है|ऎसे में नियमित उड़ान या सड़क मार्ग से प्रचार के लिए जाने से कई नेता हिचक रहे हैं |जो प्रचार के लिए जा भी रहे हैं उनकी गति धीमी है कुछ दिग्गज तो हर दूसरे – तीसरे दिन चुनाव प्रबंधक से खाली विमान की जानकारी ले रहे हैं |जवाब में हाँ मिला तो वे प्रचार के लिए उड़ान भर लेते हैं और नही तो अगली खाली तारीख तक इंतजार… |
पूरब के आक्सफोर्ड की विरह गाथा

कुछ दिनों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रावासों में जो आपराधिक गतिविधियां हो रहे हैं वह आश्चर्यजनक है एक समय था जब इसे पूरब के ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले विश्वविद्यालय के छात्रावासों में आईएस व पीसीएस के लिए छात्र चयनित होते थे लेकिन दुर्भाग्यवश आज यही छात्रावास बम बनाने की फैक्ट्री बनती जा रही है कहते हैं कि गेहूं के साथ घुन भी पिसा जाता है आपराधिक प्रवृत्ति के छात्रों के चक्कर में कुछ मेधावी छात्रों का भी भविष्य अंधकार में चला जा रहा है तमाम छात्र परीक्षा देने से वंचित हो गए हैं ऐसे छात्रों के परिजन जिस आशा व उम्मीद के साथ अपने पल्यो का विश्वविद्यालय में दाखिला करवाया उस पर पानी फिरता नजर आ रहा है यही नहीं छात्रावास के अलावा शहर की कई मोहल्लों में किराए पर कमरा लेकर छात्र रहते हैं वहां आए दिन बवाल होता रहता है|छात्रों में लगातार बढ़ रही आवेश प्रवृति पर जल्द ही अगर काबू नहीं पाया गया तो पश्यातप के अलावा और कुछ नहीं बचेगा…?
Movie Review ~सोनचिड़िया

फ़िल्म : सोनचिड़िया
निर्देशक: अभिषेक चौबे
निर्माता: रानी स्क्रूवाला
स्टार कास्ट : सुशांत सिंह राजपूत, भूमि पेडनेकर, मनोज बाजपेयी, रणवीर शौरी, आशुतोष राणा
: फिल्म सोन चिड़िया चम्बल के खूंखार डकैतों के जीवन पर आधारित है|70 के दशक के बागियों की कहानी है पुलिस से बचने के लिए बीहड़ में पैदल भूखे प्यासे मारे- मारे फिरते हैं| अमूमन फिल्मो में डाकुओं को घोड़े पर सवार होकर डकैती करते दिखाया जाता है लेकिन फ़िल्म सोन चिड़िया में ऎसा कुछ नहीं है
कहानी डाकू मान सिंह(दद्दा) के गैंग की है|दद्दा धर्म और भगवान में विश्वास रखता है कहानी लखना और वकील की संघर्ष की हैं| एक युवती की है ससुराल वालों से एक निर्दोष बच्ची को बचने की|कहानी है निजी रंजिश के बदले की|इतना ही नहीं जाति भेदभाव, समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति, पुरुषसत्ता और पश्चाताप की, इतने तथ्यों का समागम है इसमें|
कास्ट अभिनय: सुशांत सिंह राजपूत ने अपने भूमिका को जबरदस्त निभाया है
मनोज बाजपेयी का रोल छोटा रहा लेकिन उनके अभिनय को छोटा कहना उचित नहीं होगा
रणवीर शौरी और भूमि पेडनेकर ने अपने अभिनय में जान डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी|भूमि बच्ची को सोन चिरैया की लोरी सुनाते हुए चेहरे का भाव काबिले तारीफ है|
आशुतोष राणा ने अपने रोल का जबरदस्त फायदा लिया पुलिस पावर यूज़ कर डकैतों का जिस तरह से सफाया किया, वह काबिले तारीफ हैं
फ़िल्म के सभी कास्ट अपने अपने रोल को बखूबी से निभाया है
टेक्निकल स्टाफ: फिल्म का कैमरा वर्क गजब का है फ़िल्म की पहली सीन ही अद्भुत है जो फ़िल्म को देखने की उत्सुकता बड़ाती हैं|
अभिषेक चौबे साहब ने वर्षो से सुनसान पड़े चम्बल के बीहड़ों को पर्दे के माध्यम से एक बार फिर पुराने यादों को ताजा कर डकैतों के काटे भरी जीवन और उनके खौफ का परिचय कराया फ़िल्म शुरू से अंत तक दर्शको को बांधे रखने की हिम्मत रखती है
फ़िल्म अच्छी नहीं बहुत अच्छी है
यादों के झरोखे ‘नामवर सिंह’

~बदला किससे? सबक किसको? जो भी आरोप वक्तीगत लगा अनदेखा किया। वाद – विवाद संवाद उन्ही से किया जो बराबर के है या कुछ बड़े। ‘सहयोगी प्रयास’ के तहत। यहां तक कि दस्ते अदु के साथ भी, फैज के अंदाज में ‘सलूक जिससे किया मैंने आशिकाना किया। ~
नामवर सिंह जी हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ शोधकार – समालोचक, निबंधकार रहे। उनमें संवाद, संप्रेषण और सहभागिता की गहरी संस्कृति मौजूद थी। उनके लेखन व वक्तव्य में हजार वर्षो की ध्वनियां बोलती थी। वे एक ऐसी परंपरा के पोषक थे जो संवादी और बहुलतावादी हो। उनके कविताओं में छायावाद के नए प्रतिमान देखे जा सकते हैं। तुलसी का यह वस्की ‘तब मैं रहेहुँ अचेत’ उनके साहित्य चिंतन का निकस था। वे हिंदी दुनिया की अदितीय मेधा थे। संस्कार, स्वभाव व स्वाभिमान से खांटी बनारसी रहे। यहां का अस्सी, गंगा और हिंदी विभाग उनके रक्त में समाहित रहा। काशी में उनका उनमेष ही तब हुआ जब यहाँ से प्रसाद, प्रेमचंद और आचार्य शुक्ल विदा हो चुके थे। यह उनके जैसी विलक्षण मेधा के वश की ही बात थी कि इतनी बड़ी विरासत को वे अकेले ही संभालने में सक्षम रहे। संस्कृत, अपभ्रश, पाश्चात्य साहित्य शास्त्र, भारतीय साहित्य शास्त्र की अत्यधिक विशेषताओं को समझते हुए हिन्दी की नई रचनाशीलता को समझते व सराहते रहे। अपनी वक्त्य कोशल से हिंदी आलोचना को न केवल रचनात्मक बनाया बल्कि एक सजग प्रहरी की तरह नई दिशा भी दी। यह उन्ही की देन है कि हिंदी कविता मंचीय आकर्षण से सदा दूर रही और हिंदी साहित्य मुख्य धारा की परंपरा, आधुनिकता व नवाचार के दायरे में आगे बढ़ता रहा। समय – समय पर हिंदी की रचऩाशीलता पर उनका दबाव भी रहा जिसको लेकर विवाद भी होते रहे लेकिन सदा के भांति मुस्कुराते हुए वे कहते आरोप बिछा कर बैठने की चीज है। ओढ़ने का नहीं।नामवर जी एक आत्ममुक्त अलोचक थे जिसने सदा ही अपनी आँख की भी परीक्षा की।
यही उनकी प्रतिष्ठा, विश्वसनीयता व सजग सक्रियता का प्रतीक है कि पिछले पांच दशक से हर पीढ़ी ने उन्हें ‘उम्मीद’ से देखा और इसी कारण समय – समय पर असंतोष भी व्यक्त किया।
जो नामवर पिछले वर्षो में आलोचना के प्रतिमान व परंपरा का निर्माण करते रहे, वे अब वे खुद प्रतिमान व परम्परा बन गए हैं।
Ankur is back

आगरा_ ताजमहल मुगल वस्तुकला के उत्कृष्ट नमूनों में से एक , ताज सचे प्यार के जीता जागता उदाहरण है ताज का निर्माण मुगल शासक शाहजहाँ ने अपनी महरूम पत्नी मुमताज के याद में बनवाया.. 🚶♂️
The Journey Begins
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