यादों के झरोखे ‘नामवर सिंह’

~बदला किससे? सबक किसको? जो भी आरोप वक्तीगत लगा अनदेखा किया। वाद – विवाद संवाद उन्ही से किया जो बराबर के है या कुछ बड़े। ‘सहयोगी प्रयास’ के तहत। यहां तक कि दस्ते अदु के साथ भी, फैज के अंदाज में ‘सलूक जिससे किया मैंने आशिकाना किया। ~

नामवर सिंह जी हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ शोधकार – समालोचक, निबंधकार रहे। उनमें संवाद, संप्रेषण और सहभागिता की गहरी संस्कृति मौजूद थी। उनके लेखन व वक्तव्य में हजार वर्षो की ध्वनियां बोलती थी। वे एक ऐसी परंपरा के पोषक थे जो संवादी और बहुलतावादी हो। उनके कविताओं में छायावाद के नए प्रतिमान देखे जा सकते हैं। तुलसी का यह वस्की ‘तब मैं रहेहुँ अचेत’ उनके साहित्य चिंतन का निकस था। वे हिंदी दुनिया की अदितीय मेधा थे। संस्कार, स्वभाव व स्वाभिमान से खांटी बनारसी रहे। यहां का अस्सी, गंगा और हिंदी विभाग उनके रक्त में समाहित रहा। काशी में उनका उनमेष ही तब हुआ जब यहाँ से प्रसाद, प्रेमचंद और आचार्य शुक्ल विदा हो चुके थे। यह उनके जैसी विलक्षण मेधा के वश की ही बात थी कि इतनी बड़ी विरासत को वे अकेले ही संभालने में सक्षम रहे। संस्कृत, अपभ्रश, पाश्चात्य साहित्य शास्त्र, भारतीय साहित्य शास्त्र की अत्यधिक विशेषताओं को समझते हुए हिन्दी की नई रचनाशीलता को समझते व सराहते रहे। अपनी वक्त्‍य कोशल से हिंदी आलोचना को न केवल रचनात्मक बनाया बल्कि एक सजग प्रहरी की तरह नई दिशा भी दी। यह उन्ही की देन है कि हिंदी कविता मंचीय आकर्षण से सदा दूर रही और हिंदी साहित्य मुख्य धारा की परंपरा, आधुनिकता व नवाचार के दायरे में आगे बढ़ता रहा। समय – समय पर हिंदी की रचऩाशीलता पर उनका दबाव भी रहा जिसको लेकर विवाद भी होते रहे लेकिन सदा के भांति मुस्कुराते हुए वे कहते आरोप बिछा कर बैठने की चीज है। ओढ़ने का नहीं।नामवर जी एक आत्ममुक्त अलोचक थे जिसने सदा ही अपनी आँख की भी परीक्षा की।

यही उनकी प्रतिष्ठा, विश्वसनीयता व सजग सक्रियता का प्रतीक है कि पिछले पांच दशक से हर पीढ़ी ने उन्हें ‘उम्मीद’ से देखा और इसी कारण समय – समय पर असंतोष भी व्यक्त किया।

जो नामवर पिछले वर्षो में आलोचना के प्रतिमान व परंपरा का निर्माण करते रहे, वे अब वे खुद प्रतिमान व परम्परा बन गए हैं।

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